Vo darvaza

दरवाज़ों का सिरहाना पकड़ कर बैठ जाती हूं मैं अक्सर।
सोचती हूं इसने कितने ही लोगों को आते जाते देखा होगा। कितने ही रिश्तों के जुड़ने और टूटने का गवाह रहा होगा ये। कितनी ही बार दो लोगों ने इसके दोनों तरफ़ बैठ कर आंसू बहाए होंगे नाराज़गी और बिछुड़न के गम में।
कितनी ही बार किसी की ज़िन्दगी और मौत के बीच का फासला रहा होगा ये दरवाज़ा। .
और न जाने कितनी बार अपने हृदय को कचोटते हुए इसने मांगा होगा कि काश मैं होता ही नहीं। .
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और अगर इस सबके बाद थोड़ा वक़्त बच जाए तो मैं उस शख्स के खयालों में खो जाती हूं जो मेरे दर पर कभी आया ही नहीं।



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